शुरुआत एक आम कन्फ्यूज़न से…
मान लीजिए आपकी MRI रिपोर्ट में लिखा है – “lumbar spinal stenosis with disc bulge” (लम्बर स्पाइनल स्टेनोसिस विथ डिस्क बल्ज) और डॉक्टर ने जल्दी-जल्दी समझाया भी, लेकिन दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा है –
“स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर क्या है? मेरे दर्द की असली वजह कौन-सी है?”
यही कन्फ्यूज़न दूर करने के लिए यह पूरी गाइड लिखी गई है – ताकि आप स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर अच्छे से समझें, अपने लक्षणों को पहचानें, और सही डायग्नोसिस से सही इलाज चुन सकें।

Table of Contents
रीढ़ की हड्डी की सरल समझ: बात यहीं से शुरू होती है
स्पाइन को समझे बिना स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर पकड़ना मुश्किल है, इसलिए पहले एक सिंपल पिक्चर बना लेते हैं।
- आपकी रीढ़ कई हड्डियों (vertebrae) की चेन जैसी बनी होती है।
- हर दो वर्टिब्रा के बीच में एक नरम “कुशन” होता है, जिसे डिस्क कहते हैं।
- इन हड्डियों के बीच से स्पाइनल कॉर्ड और नसें गुजरती हैं – इन्हीं के लिए पीछे की तरफ एक टनल जैसी जगह होती है, जिसे स्पाइनल कैनाल कहते हैं।
- जब यह टनल तंग हो जाती है → स्पाइनल स्टेनोसिस
- जब डिस्क अपनी जगह से बाहर उभर कर नस को चिढ़ाने लगती है → डिस्क बल्ज/हर्निएशन
इन्हीं दो बदलावों के कारण बहुत से लोगों को कमर, टांग या गर्दन–बाहों में दर्द, सुन्नपन, कमजोरी जैसे लक्षण महसूस होते हैं।
स्पाइनल स्टेनोसिस क्या है?
स्पाइनल स्टेनोसिस की आसान परिभाषा
स्पाइनल स्टेनोसिस का मतलब है – स्पाइन के अंदर की जगह का तंग होना, चाहे वह:
- सेंट्रल कैनाल (जहाँ से स्पाइनल कॉर्ड गुजरता है),
- लैटरल रीसेस,
- या न्यूरल फोरामिन (जहाँ से नसें बाहर आती हैं) में हो।
जब यह स्पेस कम होता है, तो स्पाइनल कॉर्ड या नसों पर दबाव बढ़ जाता है और चलने-फिरने पर दर्द, जलन, सुन्नपन, heaviness जैसे लक्षण आते हैं।
स्पाइनल स्टेनोसिस क्यों होता है?
अधिकतर मामलों में यह एक डिजेनेरेटिव (wear-and-tear) प्रोसेस के कारण होता है – यानी उम्र के साथ होने वाले घिसाव की वजह से:
- हड्डियों के किनारों पर बोन स्पर (osteophytes) बनना
- लिगामेंटम फ्लावम का मोटा और कठोर हो जाना
- फेसट जोइंट में आर्थराइटिस
- पहले से मौजूद डिस्क बल्ज या हर्निएशन के साथ स्पेस और कम होना
- कभी-कभी पुरानी सर्जरी, चोट या जन्म से ही टनल पतली होना
सबसे ज़्यादा यह समस्या 50 साल से ज़्यादा उम्र में देखी जाती है, खासकर कमर (lumbar spinal stenosis) में।
स्पाइनल स्टेनोसिस के क्लासिक लक्षण
- खड़े रहने या चलने पर टांगों में दर्द/झुनझुनी/ heaviness
- कुछ दूरी चलने पर टांगों में थकान, जकड़न – जिसे अक्सर neurogenic claudication कहा जाता है
- आगे झुकने, बैठने या आगे झुककर साइकिल चलाने जैसी पोज़िशन में दर्द का कम होना
- कमर या निचले हिस्से में dull ache या जकड़न
- लंबा समय खड़े रहने पर लक्षणों का तेज़ होना
यही पैटर्न बाद में स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर समझने के लिए सबसे बड़ा क्लू बनता है।
डिस्क बल्ज क्या होता है?
डिस्क की संरचना और बल्ज
हर डिस्क दो मुख्य हिस्सों से बनी होती है:
- बाहर का tough रिंग – annulus fibrosus
- अंदर का gel जैसा हिस्सा – nucleus pulposus
जब यह बाहरी रिंग कमजोर या फटने लगती है, तो अंदर का हिस्सा बाहर की तरफ उभरने लगता है – इसे ही आम भाषा में डिस्क बल्ज या ज़्यादा severe होने पर डिस्क हर्निएशन कहा जाता है।
डिस्क बल्ज क्यों होता है?
- अचानक भार उठाना, झुककर वजन उठाना
- लंबे समय तक बैठकर काम करना
- smoking, overweight, lack of exercise जैसे risk factors
- genetic कारण और age-related degeneration
डिस्क बल्ज के लक्षण
अगर डिस्क बल्ज के कारण किसी नस पर दबाव पड़ता है तो:
- एक तरफ टांग में तेज़, शूटिंग या जलन वाला दर्द (sciatica जैसा)
- खाँसी, छींक या ज़ोर लगाने पर दर्द का अचानक बढ़ जाना
- पैरों में किसी खास area में सुन्नपन या झुनझुनी
- किसी विशेष muscle group में कमजोरी या ankle reflex का कम होना
- अक्सर दर्द अचानक शुरू होता है – “एक दिन झुककर कुछ उठाया और कमर में झटका लगा” जैसा इतिहास मिल सकता है
यहीं से symptom pattern के आधार पर स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर साफ होने लगता है – एक में चलने से दर्द बढ़ता, बैठने से आराम; दूसरे में बैठने पर भी नस वाला दर्द बना रह सकता है।

स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर क्या है? (Core Comparison)
अब आते हैं मुख्य बात पर – स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर को practically कैसे समझें?
1. उम्र और शुरुआत में अंतर
| पॉइंट | स्पाइनल स्टेनोसिस | डिस्क बल्ज |
|---|---|---|
| सामान्य उम्र | ज़्यादातर 50+ साल | 20–50 साल में भी आम |
| शुरुआत | धीरे-धीरे, महीनों–सालों में प्रोग्रेस | अक्सर अचानक या कुछ हफ्तों में |
| बैकग्राउंड | पुरानी कमर दर्द + चलने पर दिक्कत | अचानक झुकने/उठाने के बाद तेज़ दर्द |
2. दर्द के पैटर्न में अंतर
स्पाइनल स्टेनोसिस में:
- दोनों टांगों में heaviness, cramping, थकान जैसा एहसास
- लंबा चलने या खड़े रहने पर दर्द और जकड़न बढ़ती
- आगे झुकने या बैठने पर आराम मिलता है
डिस्क बल्ज में:
- ज़्यादातर एक तरफ तेज़, शूटिंग या जलन जैसा दर्द
- कमर से नितंब, जांघ के पीछे, पिंडली/पैर तक जा सकता है (sciatica pattern)
- खाँसी, छींक या ज़ोर लगाने पर अचानक झटका जैसा दर्द
- लंबे समय तक बैठने पर भी दर्द बढ़ सकता है, क्योंकि डिस्क पर प्रेशर बढ़ता है
यही फर्क रोज़मर्रा के क्लिनिकल प्रैक्टिस में स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर समझने का सबसे बड़ा आधार है।
3. चलने-फिरने पर लक्षणों का फर्क
स्पाइनल स्टेनोसिस में:
- थोड़ी दूरी चलने पर टांगों में heaviness, जकड़न या थकान
- रुकने या बैठ जाने से आराम
- आगे झुककर चलने पर (जैसे शॉपिंग ट्रॉली पकड़कर) दर्द कम होता है
डिस्क बल्ज में:
- थोड़ा चलने से कभी-कभी stiffness कम भी हो सकती है
- लेकिन बहुत देर खड़े रहने या एक ही पोज़िशन में बैठने से दर्द बढ़ता है
4. MRI रिपोर्ट में अंतर कैसे दिखता है?
MRI ही वह जगह है जहाँ डॉक्टर स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर सबसे साफ देख पाते हैं:
- स्पाइनल स्टेनोसिस में
- स्पाइनल कैनाल का diameter कम दिखता है
- “narrowing of central canal / lateral recess / neural foramina” जैसे शब्द लिखे मिलते हैं
- ligamentum flavum thickening, facet joint hypertrophy, multi-level changes आदि उल्लेख हो सकते हैं
- डिस्क बल्ज में
- किसी एक या दो levels पर focal या diffuse disc protrusion / extrusion
- “disc bulge compressing the nerve root” जैसा वर्णन
- बाकी levels अपेक्षाकृत normal दिख सकते हैं
ध्यान रहे – बहुत से लोगों में दोनों चीजें एक साथ भी मिलती हैं, इसलिए केवल रिपोर्ट देखकर नहीं, क्लीनिकल लक्षण + MRI मिलाकर ही फ़ैसला लिया जाता है।
स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर कैसे पहचानें? (स्टेप-बाय-स्टेप क्लिनिकल सोच)
अब देखते हैं कि डॉक्टर practically कैसे तय करते हैं कि आपके केस में स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर क्या है।
1. इतिहास (History Taking) से मिलने वाले संकेत
डॉक्टर आपसे कुछ ऐसे सवाल पूछते हैं:
- दर्द कब शुरू हुआ – अचानक या धीरे-धीरे?
- आपकी उम्र कितनी है, और पहली बार दर्द कब हुआ?
- चलने, खड़े रहने और बैठने पर दर्द कैसे बदलता है?
- खाँसी, छींक या ज़ोर लगाने पर क्या होता है?
- पहले भी ऐसे एपिसोड हुए हैं या यह पहली बार है?
इनके जवाबों से ही अक्सर 60–70% क्लैरिटी मिल जाती है कि मरीज में स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर किस दिशा में है।
2. फिजिकल एग्ज़ामिनेशन के क्लू
- Straight Leg Raise (SLR) टेस्ट
- ज़मीन पर लेटकर पैर उठाने पर टांग में तेज़ नस वाला दर्द आए तो यह आमतौर पर डिस्क बल्ज/हर्निएशन का मजबूत संकेत होता है।
- Extension vs Flexion टेस्ट
- पीछे की तरफ झुकने (extension) से अगर पैर में heaviness या दर्द बढ़ता और आगे झुकने से कम होता है, तो यह स्पाइनल स्टेनोसिस के पक्ष में जाता है।
- Neurological Exam
- muscle strength, reflexes (जैसे ankle jerk), touch और pinprick sensation का pattern
- disc bulge में अक्सर एक specific nerve root की findings दिखती हैं, जबकि stenosis में कभी-कभी multi-level involvement भी हो सकता है।
3. कब MRI और अन्य टेस्ट ज़रूरी होते हैं?
हर कमर दर्द में MRI कराना ज़रूरी नहीं होता। अधिकांश गाइडलाइन पहले conservative treatment की सलाह देती हैं, खासकर अगर कोई serious red flag न हो।
लेकिन इन हालात में MRI ज़्यादा strongly सोचा जाता है:
- 6–8 हफ्ते से ज़्यादा समय से लगातार या बढ़ता हुआ दर्द
- टांग/बाहों में प्रोग्रेसिव कमजोरी
- चलने की क्षमता में स्पष्ट कमी (कुछ कदम से ज़्यादा चलना मुश्किल)
- पेशाब या मल पर कंट्रोल में बदलाव, या private area में सुन्नपन
- ट्रॉमा, कैंसर, TB, बुखार, unexplained weight loss जैसे संकेतों के साथ बैक पेन
MRI से डॉक्टर फिर अच्छे से समझ पाते हैं कि आपके केस में स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर किस तरह है और किस condition को प्राथमिकता देकर ट्रीट करना है।
सही डायग्नोसिस के बाद सही इलाज: मुख्य विकल्प
जब एक बार यह साफ हो जाए कि आपके केस में स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर क्या है, तभी सही ट्रीटमेंट प्लान बन पाता है।
1. कॉमन प्रिंसिपल: हर दर्द में सर्जरी ज़रूरी नहीं
अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइन यह मानती हैं कि:
- बहुत से मरीज non-surgical treatment से ही काफी बेहतर हो सकते हैं
- education, activity modification, exercise, weight control, pain management, sleep और mental health – ये सब मिलकर काम करते हैं
- बहुत strong painkillers या opioids का लंबा इस्तेमाल जहाँ तक हो सके avoid किया जाता है
2. स्पाइनल स्टेनोसिस में ट्रीटमेंट
(क) Lifestyle और Posture मॉडिफिकेशन
- आगे हल्का झुककर चलना, अचानक पीछे की ओर ज़्यादा झुकने से बचना
- long standing यानी लंबे समय तक एक ही जगह खड़े रहने से बचना
- बार-बार छोटी-छोटी breaks लेना, चलना–फिरना, position बदलना
(ख) Medication
- simple pain-relievers (डॉक्टर की सलाह के अनुसार)
- कुछ patients में nerve pain कम करने वाली दवाइयाँ
- जरूरत पड़ने पर vitamin B12 आदि supplements
(ग) Physiotherapy
- flexion-friendly exercises, जहाँ spine हल्का आगे झुकी पोज़िशन में रहती है
- core और hip strengthening, ताकि भार का वितरण बेहतर हो
- balance और endurance training, ताकि चलने की capacity बढ़ सके
(घ) Injections
- कुछ selected cases में epidural steroid injections short-term राहत दे सकते हैं, खासकर जब दर्द बहुत ज़्यादा हो और oral medicines से control मुश्किल लग रहा हो।
(ङ) Surgery कब सोची जाती है?
- जब neurogenic claudication बहुत severe हो और patient कुछ ही कदम चल पाता हो
- जब लंबे समय की conservative therapy के बावजूद quality of life बहुत खराब हो
- जब progressive neurological deficit (कमजोरी, reflex loss) दिखे
- ऐसे में decompression (जैसे laminectomy, laminotomy या minimally invasive techniques) पर विचार किया जाता है।
3. डिस्क बल्ज में ट्रीटमेंट
(क) Acute Phase Care
- कुछ दिन relative rest – यानी दर्द को बढ़ाने वाली activities से बचना, लेकिन बिल्कुल bed rest नहीं
- simple painkillers, muscle relaxants (कम समय के लिए)
- अचानक आगे झुकने, भारी वजन उठाने जैसी हरकतों से बचना
(ख) Physiotherapy और Exercise
- दर्द की अवस्था के अनुसार extension या flexion-based protocol (ये therapist decide करता है)
- core stabilization exercises, hip mobility और hamstring stretching
- धीरे-धीरे walking और हल्की गतिविधियाँ बढ़ाना
(ग) Education & Self-Management
- मरीज को समझाना कि अधिकांश cases में disc bulge या herniation time के साथ शांत हो सकता है
- सही posture, ergonomics और regular exercise से future episodes की risk कम की जा सकती है
(घ) Injections / Advanced Options
- selected cases में nerve root blocks या epidural injections
- बहुत severe या progressive weakness, cauda equina syndrome, या बार-बार disabling episodes होने पर surgery (जैसे microdiscectomy) सोची जा सकती है
और गहराई से पढ़ने के लिए भरोसेमंद संसाधन
अगर आप खुद भी पढ़ना पसंद करते हैं, तो इन जैसी भरोसेमंद health websites पर “spinal stenosis” और “herniated disc” के patient-friendly पेज देख सकते हैं:
ऐसी वेबसाइटें evidence-based और नियमित रूप से अपडेट होती रहती हैं, जिससे आपको स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर वैज्ञानिक नज़र से भी समझने में मदद मिलेगी।
घर पर क्या करें, क्या न करें? (Do & Don’t Checklist)
रोज़मर्रा की गतिविधि में ध्यान रखने वाली बातें
क्या करें (Do):
- रोज़ थोड़ा-थोड़ा चलना, बिल्कुल immobilize न होना
- आरामदायक, supportive चेयर में बैठना
- वजन नियंत्रित रखने की कोशिश, खासकर पेट की चर्बी कम करना
- सही तरीके से झुकना – घुटनों को मोड़कर, कमर पर अचानक झटका न डालना
- डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट द्वारा बताए गए exercises नियमित करना
क्या न करें (Don’t):
- बार-बार आगे झुककर heavy वजन उठाना
- लगातार कई घंटे एक ही posture में बैठना (जैसे कंप्यूटर पर 3–4 घंटे बिना उठे बैठे रहना)
- खुद से strong painkillers या steroids बार-बार लेना
- इंटरनेट से random exercises उठाकर तुरंत करना – हर exercise हर condition के लिए सुरक्षित नहीं होती
याद रखें – घर पर care बहुत ज़रूरी है, लेकिन बिना समझे की गई activity से स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर और उलझ सकता है, क्योंकि लक्षण अक्सर खराब हो जाते हैं।
कब तुरंत डॉक्टर या इमरजेंसी की ज़रूरत है?
चाहे stenosis हो या disc bulge, इन red flags में देर नहीं करनी चाहिए:
- अचानक टांगों में इतनी कमजोरी कि चलना मुश्किल हो जाए
- पेशाब या मल पर कंट्रोल कम होना, या अचानक खत्म हो जाना
- private area (सैडल एरिया) में सुन्नपन या अजीब sensation
- रात को तेज़ बुखार, ठंड लगना, weight loss, कैंसर या TB के इतिहास के साथ severe back pain
- गिरने या accident के बाद अचानक कमर/टांग में neurological लक्षण
ये सब spinal cord या nerve roots पर serious दबाव या infection/ट्यूमर के संकेत हो सकते हैं – ऐसे में emergency evaluation ज़रूरी है।
अक्सर होने वाली गलतफहमियां (Myth vs Fact)
| मिथ | सच |
|---|---|
| MRI में “स्टेनोसिस” लिखा मतलब तुरंत सर्जरी ज़रूरी है | हर स्पाइनल स्टेनोसिस में सर्जरी नहीं; बहुत से लोग conservative treatment से manage हो जाते हैं। |
| डिस्क बल्ज का मतलब हमेशा lifelong दर्द | कई मामलों में disc bulge समय के साथ shrink या शांत हो जाता है, और मरीज normal life जी सकता है। |
| एक्सरसाइज़ करने से डिस्क और “खिसक” जाएगी | सही technique और supervision के साथ exercise recovery को तेज़ करती है; गलत या over-aggressive exercise नुकसान कर सकती है। |
| एक बार surgery हो गई तो problem हमेशा के लिए खत्म | surgery symptoms कम कर सकती है, लेकिन lifestyle और posture न बदलने पर future में दोबारा issues हो सकते हैं। |
| low back pain का मतलब हमेशा spinal stenosis या disc bulge है | low back pain के दर्जनों कारण होते हैं; हर दर्द का कारण structural problem या MRI finding नहीं होता। |
इन myths को समझना भी स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर practically पहचानने का हिस्सा है – क्योंकि real expectations clear होना उतना ही important है जितना सही इलाज।
FAQs: स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर से जुड़े आम सवाल
क्या हर कमर दर्द का मतलब स्पाइनल स्टेनोसिस या डिस्क बल्ज होता है?
ज़रूरी नहीं। ज़्यादातर लोगों में low back pain nonspecific होता है – यानी muscles, ligaments, posture, lifestyle जैसे कारणों से भी दर्द हो सकता है। सिर्फ MRI में लिखे शब्दों से डरने की बजाय, clinical evaluation से ही तय होता है कि वास्तव में स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर आपके केस में कितना relevant है।
MRI में स्पाइनल स्टेनोसिस लिखा लेकिन मुझे बहुत कम तकलीफ़ है – क्या चिंता की बात है?
बहुत से लोगों में MRI पर spinal stenosis दिखता है, लेकिन clinical symptoms हल्के या almost न के बराबर होते हैं। ऐसे में अक्सर lifestyle change, exercise और follow-up काफी होता है। सिर्फ रिपोर्ट देखकर घबराने के बजाय डॉक्टर से मिलकर समझें कि आपकी body में यह finding वास्तव में कितनी असर डाल रही है।
डिस्क बल्ज और डिस्क हर्निएशन में क्या फर्क है?
डिस्क बल्ज में disc का outer ring अपनी जगह पर रहते हुए थोड़ा बाहर की ओर उभर जाता है। हर्निएशन में अंदर का gel जैसा हिस्सा रिंग के बाहर तक ज़्यादा निकल आता है और कभी-कभी टुकड़ों के रूप में nerve को और irritate करता है। दोनों ही हालात में नस दब सकती है, लेकिन हर disc bulge खतरनाक या operation लायक नहीं होता।
कैसे समझें कि मेरे दर्द का main कारण स्पाइनल स्टेनोसिस है या डिस्क बल्ज?
उम्र, शुरुआत, दर्द का pattern, चलने–बैठने पर बदलाव, खाँसी/छींंक पर response – ये सब clues देते हैं
फिजिकल exam और neurological tests से दिशा और clear होती है
MRI इसे confirm करने में मदद करता हैअगर दोनों ही (स्टेनोसिस + डिस्क बल्ज) हों तो इलाज कैसे तय होता है?
ऐसे cases बहुत common हैं। treatment plan आपकी primary complaint के हिसाब से बनता है –
अगर चलने पर neurogenic claudication dominate कर रहा है तो stenosis-targeted approach
अगर तेज़ नस वाला pain ज्यादा है तो disc-focused strategy
कई बार दोनों को साथ address करने वाला combined plan भी बनाया जाता है।क्या सिर्फ एक्सरसाइज़ से स्पाइनल स्टेनोसिस या डिस्क बल्ज ठीक हो सकता है?
structural changes पूरी तरह reverse हों, यह उम्मीद हर केस में सही नहीं होती, लेकिन:
सही exercise program से दर्द कम हो सकता है
functional capacity और walking tolerance बढ़ सकती है
future episodes की risk घट सकती है
कई मरीज सिर्फ conservative treatment से ही काफी अच्छा improvement हासिल कर लेते हैं।7. क्या वज़न कम करने से फर्क पड़ता है?
हाँ, overweight होने से spine पर mechanical load बढ़ता है और degeneration तथा pain की संभावना बढ़ जाती है। वजन नियंत्रित रखने से कमर और पैरों पर दबाव घटता है और स्पाइनल स्टेनोसिस तथा डिस्क बल्ज दोनों में symptoms manage करने में मदद मिलती है।
8. कितने समय में डिस्क बल्ज के लक्षण आमतौर पर बेहतर होते हैं?
कई मामलों में 6–12 हफ्तों के भीतर, सही दवाइयों, फिजियोथेरेपी, posture सुधार और activity modification के साथ noticeable improvement दिखता है। लेकिन हर व्यक्ति अलग होता है, इसलिए कुछ को जल्दी आराम मिलता है, कुछ को ज़्यादा समय या अतिरिक्त इलाज की ज़रूरत पड़ सकती है।
9. क्या योगा या जिम करना सुरक्षित है?
सही technique, gradual progression और trained supervision के साथ योगा और जिम दोनों ही helpful हो सकते हैं। लेकिन:
acute, तेज़ नस वाले दर्द में high-load exercises से बचें
spinal stenosis में extreme extension-based back bending (बहुत पीछे झुकने वाले आसन) avoid करें
हमेशा अपने therapist/doctor से पूछकर ही program शुरू या modify करें, ताकि स्पाइनल स्टेनोसिस और डिस्क बल्ज में अंतर को ध्यान में रखते हुए activity customize हो सके।10. क्या बार-बार MRI करवाना ज़रूरी है?
नहीं। जब तक clinical condition में बड़ा बदलाव न हो – जैसे अचानक weakness, bladder/bowel control में समस्या, बुखार या trauma – routine repeat MRI की ज़रूरत बहुत कम होती है। treatment decisions को imaging से ज़्यादा आपके symptoms और functional status पर आधारित होना चाहिए।




